142. देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको!

आज राज कपूर जी की  फिल्म – ‘फिर सुबह होगी’ का एक युगल गीत याद आ रहा है, जिसे साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है, खैय्याम जी ने इसका संगीत तैयार किया है और इस गीत को मुकेश जी और आशा भौंसले जी ने गाया है।

गीत का विषय, जैसे कि आम तौर पर होता है, प्रेम ही है। लेकिन यहाँ प्रेमी-प्रेमिका, दोनों एक-दूसरे को सावधान कर रहे हैं, कि देखो फिर मत कहना कि बताया नहीं था, हम प्यार की तरफ आगे बढ़ रहे हैं।

एक बात कही जा सकती है आज की भाषा में कि प्यार दोनों कर रहे हैं, लेकिन ज़िम्मेदारी, ऑनरशिप लेने को कोई तैयार नहीं है!

अब इसमें मेरे कहने की तो कोई बात नहीं है, बस इतना ही कहूंगा कि इस युगल गीत की सुंदरता को देखिए और मुकेश जी और आशा ताई की अदायगी को याद कीजिए-

मुकेश: फिर ना कीजै मेरी गुस्ताख़ निगाहों का गिला
देखिये आप ने फिर प्यार से देखा मुझको
आशा: मैं कहाँ तक ये निगाहों को पलटने देती
आप के दिल ने कई बार पुकारा मुझको।

मुकेश: इस कदर प्यार से देखो ना हमारी जानिब  
दिल अगर और मचल जाये तो मुश्किल होगी
आशा: तुम जहाँ मेरी तरफ़ देख के रुक जाओगे
वही मंजिल मेरी तक़दीर की मंजिल होगी  
मुकेश: देखिये आप ने फिर प्यार से देखा मुझको
आशा: आप के दिल ने कई बार पुकारा मुझको। 

मुकेश: एक यूँहीं सी नजर दिल को जो छू लेती है
कितने अरमान जगाती है तुम्हे क्या मालूम
आशा: रूह बेचैन है कदमों से लिपटने के लिये
तुमको हर साँस बुलाती है तुम्हे क्या मालूम
मुकेश: देखिये आप ने फिर प्यार से देखा मुझको
आशा: आप के दिल ने कई बार पुकारा मुझको। 

मुकेश: हर नज़र आप की जज़बात को उकसाती है
मैं अगर हाथ पकड़ लूं तो खफ़ा मत होना
आशा: मेरी दुनिया-ए-मोहब्बत है तुम्हारे दम से
मेरी दुनिया-ए-मोहब्बत से जुदा मत होना
मुकेश: देखिये आप ने फिर प्यार से देखा मुझको
आशा: आप के दिल ने कई बार पुकारा मुझको। 

नमस्कार

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141. दिल से दिल की बात कही और रो लिए।

आज लता मंगेशकर जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, जिसे राजेंदर कृष्ण जी ने लिखा है और इसके लिए संगीत दिया है, मदन मोहन जी ने।

बड़े सुंदर बोल हैं, दिल को छूने वाले जिनको लता जी की आवाज और मदन मोहन जी के संगीत ने बहुत प्रभावशाली बना दिया है।

कुल मिलाकर बात यही है कि मुहब्बत में कभी ऐसे हालात आ जाते हैं कि सपने, ख्वाहिशें, हसरतें सब लापता हो जाते हैं, प्रेमी (या प्रेमिका) खुद से ही बात करते हुए रह जाते हैं। जो सपने देखे थे वे सब टूट जाते हैं।

सभी को खुशी की तलाश होती है, मुहब्बत में भी खुशी ही पाना चाहते हैं। लेकिन होता यह भी है कि खुशी के स्थान पर दुखों को अंगीकार करना पड़ता है। प्रेम करने वाले का दिल जो फूल की तरह है, वह मुरझा जाता है, और हाँ जब दुखों के बोझ में दबकर वह चुप हो जाता/जाती है, तब लोग कहते हैं, क्या हुआ जी, कुछ बोलिए न!

ये तो मेरा मन हुआ कि कुछ अपने शब्दों में भी कह दूं, लीजिए अब इसको पढ़कर, लता जी की गाई गज़ल के प्रभाव को याद कीजिए-

 

यूँ हसरतों के दाग़, मुहब्बत में धो लिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये। 

घर से चले थे हम तो, खुशी की तलाश में 
ग़म राह में खड़े थे वही, साथ हो लिये।
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

मुरझा चुका है फिर भी ये दिल फूल ही तो है
अब आप की खुशी इसे काँटों में तोलिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

होंठों को सी चुके तो, ज़माने ने ये कहा 
ये चुप सी क्यों लगी है अजी, कुछ तो बोलिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

यूँ हसरतों के दाग़, मुहब्बत में धो लिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये। 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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140. एक छलिया आस के पीछे, दौड़े तो यहाँ तक आए!

चलो एक ख्वाब बुनते हैं,

नई एक राह चुनते हैं।

अंधेरा है सफर तो क्या,

कठिन है रहगुज़र तो क्या,

हमारा फैसला तो है,

दिलों में हौसला तो है।

बहुत से ख्वाब हैं,

जिनको हक़ीकत में बदलना है,

अभी एक साथ में है

कल इसे साकार करना है,

निरंतर यह सफर

ख्वाबों का, इनके साथ पलना है,

नहीं हों ख्वाब यदि तो

ज़िंदगी में क्या बदलना है!

ये बिखरे से कुछ अल्फाज़,

इनमें क्या है कुछ मानी?

हमारे ख्वाब हैं जीने का मकसद

ये समझ लो बस।

ये थे कुछ अपने शब्द, और अंत में- सपनों सौदागर स्व. राज कपूर की तरफ से, शैलेंद्र जी के शब्दों में-

इक छलिया आस के पीछे, दौड़े तो यहाँ तक आए,

हर शाम को ढलता सूरज, जाते-जाते कह जाए,

वो तय कर लेगा मंज़िल, जो इक सपना अपनाए।

सपनों का सौदागर आया, ले लो ये सपने ले लो,

तुमसे क़िस्मत खेल चुकी

अब तुम क़िस्मत से खेलो।

नमस्कार।

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139. भाषा की डुगडुगी बजाते हैं!

कुछ ऐसी पुरानी कविताएं, जो पहले कभी शेयर नहीं की थीं, वे अचानक मिल गईं और मैंने शेयर कर लीं, आज इसकी आखिरी कड़ी है। अपनी बहुत सी रचनाएं मैं शुरू के ब्लॉग्स में शेयर कर चुका हूँ, कोई इधर-उधर बची होगी तो फिर शेयर कर लूंगा।

आज की रचना हल्की-फुल्की है, गज़ल के छंद में है। इस छंद का बहुत सारे लोगों ने सदुपयोग-दुरुपयोग किया है, थोड़ा बहुत मैंने भी किया है। लीजिए प्रस्तुत है आज की रचना-

 

गज़ल

भाषा की डुगडुगी बजाते हैं,

लो तुमको गज़ल हम सुनाते हैं।

बहुत दिन रहे मौन के गहरे जंगल में,

अब अपनी साधना भुनाते हैं।

यूं तो कविता को हम,  सुबह-शाम लिख सकते,

पर उससे अर्थ रूठ जाते हैं।

वाणी में अपनी, दुख-दर्द सभी का गूंजे,

ईश्वर से यही बस मनाते हैं।

मैंने कुछ कह दिया, तुम्हें भी कुछ कहना है,

अच्छा तो, लो अब हम जाते हैं।

इसके साथ ही पुरानी, अनछुई रचनाओं का यह सिलसिला अब यहीं थमता है, अब कल से देखेंगे कि क्या नया काम करना है।

नमस्कार।

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138. अजनबी हवाएं, मौसम आदमखोर!

पुरानी कविताओं का यह खजाना भी अब निपटने को है, पुरानी जमा-पूंजी के बल पर कोई कब तक तमाशा जारी रखेगा। इस बहाने ऐसी पुरानी रचनाएं डिजिटल फॉर्म में सुरक्षित हो गईं, जो ऐसे ही कहीं कागजों में लिखी पड़ी थीं।

ये लीजिए प्रस्तुत है आज का गीत-

गीतों के सुमन जहाँ महके थे,

वह ज़मीन-

दूर, बहुत दूर।

अजनबी हवाएं,मौसम आदमखोर,

हर तरफ फिजाओं में जहरीला शोर,

सरसों की महक और

सरकंडी दूरबीन,

दूर, बहुत दूर।

कुछ हुए हवाओं में गुम, कुछ को धरती निगल गई,

जो भी अपने हुए यहाँ, उन पर तलवार चल गई,

दिवराती सांझ और

फगुआती भोर,

दूर, बहुत दूर।

मौसम के साथ-साथ बदले साथी,

दुनिया में सब-सुविधा के बाराती,

दुर्दिन में बंधी रहे-

वह कच्ची डोर,

दूर, बहुत दूर।

गीत पंक्ति जैसी आती मीठी याद,

कडुवे अनुभव भी देते मीठा स्वाद,

चांद हुआ बचपन

आहत मन चकोर

तकता कितनी दूर।

नमस्कार।

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137. लगता है लोकतंत्र इसी तरह आता है!

पिछले कुछ दिनों से अपने कुछ पुराने गीत, कविताएं आपके साथ शेयर कर रहा हूँ, जो 1988 से 2000 के बीच लिखे गए थे, लेकिन मैंने किसी मंच से शेयर नहीं किए थे, बस कहीं कागज़ों में अंकित पड़े रह गए थे।

एक बात और कि जिस समय इनको लिखकर रखा था, तब इनमें कहीं एक शब्द बदलने में पीड़ा होती थी, आज इतने वर्षों के बाद कहीं कोई शब्द नहीं जंचता तो बड़ी बेरहमी से उसको तुरंत बदल देता हूँ, लगता ही नहीं कि इसको मैंने ही लिखा था।

एक बात और, आज की रचना में कुछ चुनावी माहौल का चित्र है, जब इसको लिखा था, तब वातावरण अलग था, चुनाव के समय बहुत से बेरोज़गारों को काम मिलता था, वोट छापने का, कट्टे बनाने का, जैसे कि बिहार में माननीय लालू यादव जी का शासन था और लगता ही नहीं था कि वे कभी सत्ता से अलग होंगे। वोटिंग मशीन ने बड़ा ज़ुल्म किया है, अपने पराक्रम के बल पर जीतने का रास्ता ही बंद कर दिया।

खैर, मैं राजनीति की बात नहीं करूंगा। आज की रचना, जो गज़ल के छंद में है, आपके सामने प्रस्तुत है-

गहरे सन्नाटे में जन-गण थर्राता है,

लगता है लोकतंत्र इसी तरह आता है।

चुनने की सुविधा और मरने का इंतजाम,

ऐसे में भी भीखू, वोट डाल आता है।

एक बार चुन लें, फिर पांच बरस मौन रहें,

पाठ धैर्य का ऐसे सिखलाया जाता है।

मंचों पर भाषण, घर में कोटा वितरण,

अपना नेता कितनी मेहनत की खाता है।

हालचाल पत्रों में प्रतिदिन लिख भेजना,

मन में इससे ही आश्वस्ति भाव आता है।

                                      (श्रीकृष्ण शर्मा)

इस बीच ब्लॉगिंग साइट पर 100 फॉलोवर का आंकड़ा भी छू लिया, मुझसे जुड़ने वालों का हार्दिक आभार। मेरा विश्वास संख्या में नहीं गुणवत्ता में है। आशा है इसी प्रकार सुरुचिसंपन्न साथी जुडते जाएंगे और इस सफर को सार्थक बनाएंगे।

नमस्कार।

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137. गीत उगने दो!

आज का गीत छोटा सा है। जैसा है आपके सामने प्रस्तुत है-

मौन यूं कवि मत रहो,

अब गीत उगने दो।

अनुभव की दुनिया के

अनगिनत पड़ाव,

आसपास से गुज़र गए,

झोली में भरे कभी

पर फिर अनजाने में,

सभी पत्र-पुष्प झर गए,

करके निर्बंध, पिपासे मानव-मन को-

अनुभव-संवेदन दाना चुगने दो।

खुद से खुद की बातें

करने से क्या होगा,

सबसे, सबकी ही

संवेदना कहो,

अपने ही तंतुजाल में

उलझे रहकर तुम,

दुनिया का नया

तंत्रजाल मत सहो,

आगे बढ़कर सारे

भटके कोलाहल में,

मंजिल के लिए

लालसा जगने दो।

मौन यूं कवि मत रहो,

अब गीत उगने दो।

                                                                                          (श्रीकृष्ण शर्मा)

नमस्कार।

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